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भूतों का गढ़: भानगढ़

क्या वाकई में भूत होते हैं ? क्या वो दिखाई देते हैं ? क्या वो किसी रुप में खुद के होने का अहसास कराते हैं ? जो लोग भूत-प्रेतों में विश्वास करते हैं जाहिर है उनका जवाब हां में होगा । लेकिन नहीं मानने वाले इन बातों को हंसी में उड़ा देंगे । लेकिन भारत सरकार का पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उन लोगों में शामिल है जो इस धारणा में विश्वास करता है कि वास्तव में भूत होते हैं । यानि सरकारी तौर पर भूतों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया है । कम से कम राजस्थान के भानगढ़ किले को लेकर तो ये कहा हीं जा सकता है । किले के बाहर भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा है, जिस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि यहां सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित है।

दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर राजस्थान के अलवर जिले में स्थित भानगढ़ का किला देश की दस सबसे डरावनी भूतिया जगहों की सूची में यूं हीं शुमार नहीं है । वैसे भी, पुराने किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है । दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है और वहां आज भी रूहों का वास होने की बात कही जाती है ।भानगढ़ के किले के साथ भी कुछ ऐसा हीं संबंध और संयोग है ।

एक जमाना था जब यहां सुबह मंदिरों की घंटियों से आस्था के सुर प्रवाहित होते थे तो शाम होते ही तवायफों के घुंघरुओं की झनकार रसिकों को मदहोश कर देती थी, लेकिन आज वहां सजती है भूतों की महफिल। हालांकि यहां के भूतों को आज तक किसी ने नहीं देखा, लेकिन इनके चर्चे इतने हो चुके हैं कि इस इलाके की गिनती आज देश के सबसे बड़े भुतहा इलाके में की जाती है। कोई भी शाम ढलने के बाद रात को खंडहरनुमा भानगढ़ में ठहरने की हिम्मत नहीं कर पाता। आखिर भानगढ़ किले में ऐसा क्या है, जो लोग शाम के बाद यहां जाने से घबराते हैं ? इसी को टटोलने हम पत्रकारों की एक टीम यहां पहुंची थी।


इस क्रम में भानगढ़ के उजड़ने से जुड़ी किंवदंतियां सुनने को मिली जो यहां के जनमानस में प्रचलित हैं। इनमें भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती और तांत्रिक सिंधु शेवड़े की कहानी तो इस इलाके में खूब चटखारे लेकर सुनाई जाती है। कहते हैं कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बहुत खूबसूरत थी। एक बार वो किले से अपनी सखियों के बाजार पहुंची तो वहां खड़े एक तांत्रिक सिंधु शेवड़े की नजर उसपर पड़ी और वो उसका दीवाना हो उठा । रत्नावती ने जैसे हीं बाजार में एक इत्र की बोतल खरीदी तांत्रिक सिंधु शेवड़े ने इत्र की बोतल पर काला जादू कर उस पर वशीकरण मंत्र पढ दिया । लेकिन दुकान पर राजकुमारी के हाथों से इत्र की बोतल गिर गई और सारा इत्र एक बड़े पत्थर पर बिखर गया। इत्र पर वशीकरण मंत्र का प्रयोग किया गया था इसलिए वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल डाला ,जिससे उसकी मौत हो गई।

मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि इस किले मे रहने वाले सभी लोग जल्द ही मर जाएंगे और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी। आसपास गांवों के लोगों की मानें तो उस काली रात के बाद भानगढ़ को काल की मनहूसियत ने अपने शिकंजे में ऐसा जकड़ा की आज तक किसी इन्सान ने यहां बसने की हिम्मत नही दिखाई। एक बसी बसाई रियासत रात के अंधेरे में कहीं खो गई। समीप के गांव के ही लोगों का कहना है की भानगढ़ के किले में आज भी रानी और वहां के निवासियों की रुहें भटकती हैं। इसके अलावा इस किले भीतर कमरों में महिलाओं के रोने या फिर चूडियों के खनकने की भी आवाजें साफ सुनी जा सकती है।

एक अंग्रेज ने एक वनकर्मी के साथ एक बार रात को किले में रुकने की कोशिश की, तो दूसरे दिन दोनों के शव मिले । उसके बाद से हीं शाम के बाद किले में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई । आज भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सूर्यास्त के बाद और सूरज उगने से पूर्व किले के अंदर प्रवेश करने पर सख्त पाबंदी लगा रखी है। इसके लिए विभाग ने एक बोर्ड भी लगा रखा है । हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के जयपुर सर्किल के अधीक्षक अनिल तिवारी इसे भूतों से जोड़े जाने पर अपना विरोध दर्ज कराते हैं । वो कहते हैं- बोर्ड लगाने का मकसद भूत प्रेतों को बढ़ावा देना कतई नहीं है । किले में रौशनी नहीं है और हम नहीं चाहते कि वहां किसी पर्यटक के साथ कोई हादसा हो ।“


पुरातत्व विभाग ने यहां नौ चौकीदारों की ड्यूटी लगा रखी है । ये तीन तीन की टोली में तीन शिफ्टों में किला परिसर की सुरक्षा में तैनात रहते हैं और रात्रि गश्त भी करते है| पूछने पर एक चौकीदार बाबू राम बताता है- “ रात्रि गश्त करते समय मैंने कभी यहां कोई भूत नहीं देखा ना हीं भूतों का अहसास हुआ । हाँ जंगल होने की वजह से जंगली जानवरों का डर जरुर लगा रहता है जिसके लिए हमें सतर्क और चौकन्ना रहना पड़ता है।“

लेकिन पास के गांव वाले कुछ और हीं बताते हैं । उनकी माने तो चौकीदार सूर्यास्त होते ही किले के मुख्य द्वार के अंदर की दांयी ओर बने हनुमान मंदिर में घुस जाते हैं और तब तक बाहर नहीं निकलते की जब तक अगले दिन की सूरज की रोशनी उन्हे हौंसला न दे दे।

भानगढ़ रियासत चारों ओर दीवारों से घिरी है, जिसके अंदर प्रवेश करते ही दांयी ओर हनुमान जी का मंदिर है, तो वहीं बांयी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष नजर आते हैं। सामने एक सुनियोजित बाजार दिखाई देता है, जिसके बारे में सुनने को मिला की यहां जौहरी बाजार हुआ करता था। सड़क की दोनों ओर कतार में बनी दुकानों के खंडहर हैं। किले के आखिरी छोर पर तीन मंजिला महल हैं । इनकी दीवारें तो सही सलामत हैं लेकिन छत पूरी तरह गायब है। ऐसी अजीबोगरीब स्थिति में केवल इस अकेली इमारत के साथ नही है, बल्कि वहां सभी इमारतों का ढांचा तो सही सलामत दिखाई दिया लेकिन उनकी छत गायब मिली। सबसे खास बात जो हमें वहां देखने को मिली वो थी वहां बने भव्य मंदिरों में से किसी भी मंदिर में किसी भी भगवान की मूर्ति नहीं थी। सिवाय मुख्य द्वार पर बनें हनुमान मंदिर के।


पूछने हनुमान मंदिर के पुजारी ज्ञानसागर बताते हैं- “ यहां भगवान गोपीनाथ, सोमेश्वर, मंगलादेवी और भगवान केशव की मूर्तियां स्थापित थी, लेकिन तांत्रिक के श्राप के बाद वह मूर्तियां कहां गई या उनका क्या हुआ किसी को नहीं पता। “

भानगढ़ में शाम के बाद बेशक भूतों का डेरा लगता हो लेकिन दिन में यहां पर्यटकों की भीड़ रहती है । हर कोई अपने हिसाब से अपने अनुभव भी बांटते हैं । तीन घंटे तक भानगढ़ किला घूमने के बाद नागपुर के रवि नाइक ने बताया- “जिस बात ने हमें सबसे ज्यादा हैरान किया या हमें डर की अनुभूति करवाई वह थी यहां सब कुछ स्थिर था, तेज गति की हवा चलने के बावजूद हमने यहां छोटे पौधे से लेकर विशाल वृक्ष तक के एक भी पत्ते को हिलते हुए नहीं देखा।“

जैसे-जैसे भानगढ़ की पहचान मोस्ट हॉन्टेड प्लेस यानि घोर भूतिया स्थान के रुप में बढ़ रही है यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या भी बढ रही है । किले के बाहर छोटी मोटी दुकानें सज गई है और पार्किंग की जगह भी निकल आई है । पार्किंग की पर्ची काटनेवाला सूरजमल बताता है कि –“रोज सौ डेढ़ सौ पर्चियां कट जाती है ।“


वो भी बताता है कि कई बार बार सैलानियों को यहां से एक अनजाने डर के कारण उल्टे पैर भागना पड़ता है । लेकिन हमें यहां कोई भी ऐसा शख्स नहीं मिला जिसने कभी यहां भूत देखा हो । हां कुछ ने खंडहरों के बीच से गुजरते समय अजीब सी बेचैनी महसूस होने की बात जरुर कही । वैसे, किले के खंडहरों में टंगी सिंदूर से रंगी अजीबो-गरीब शक्लों वाली मूर्तियां कमजोर दिलवालों को भूतों के होने का अहसास कराती हैं।

लेकिन इन सबसे अलग राजस्थान का पर्यटन विभाग भूतो के गढ़ क रुप में भानगढ़ के कुख्यात होने से उत्साहित है । राजस्थान की पर्यटन मंत्री कृष्णेंद्र कौर दीपा कहती हैं- “चमत्कार एवं भूत प्रेतों से संबंधित कहानियाँ रोमांच पैदा करती हैं और पर्यटक रोमांचकारी स्थानों पर जाकर उस रोमांच को अनुभव करना चाहता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृति होने के कारण वह ऐसे स्थानों पर सत्यता की परख करने लिए पहुंचता है। वर्तमान में पर्यटकों के शौक में बदलाव दिखाई दे रहा है। पूर्व में लोग तीर्थ स्थानों का पर्यटन करते थे तथा वर्तमान में प्राकृतिक दृश्यों के साथ कौतुहल वाले स्थानों पर सैर करने जाते हैं। भानगढ़ पहुंचनेवाले पर्यटकों में भी इसी श्रेणी के लोग हैं जो सच्चाई और रोमांच से रुबरु होने यहां पहुंचते हैं ।“

मंत्री दीपा की दलीलों में दम दिखता है । हम भी भानगढ़ की सच्चाई की खोज में 300 किलो मीटर की दूरी तय करके पहुंचे थे। हमें भानगढ़ में कोई भी भूतिया आभास नहीं हुआ। जैसे अन्य स्थानों को देखा वैसा ही यह भी लगा। भूतों की कहानी सिर्फ़ वातावरण में तैरती है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।


-उदय चंद्र सिंह

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